जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर अपने गौरवशाली इतिहास और शिल्पकला के लिए जानी जाती है। यहां के कारीगरों ने एक समय ऐसा अद्भुत रथ तैयार किया, जिसे ‘इन्द्र विमान’ कहा गया। यह दो मंजिला रथ रामायण में वर्णित पुष्पक विमान की तर्ज पर बनाया गया था, जो अपने समय में आकर्षण का केंद्र बना रहा।
शास्त्रों के आधार पर हुआ निर्माण
इस रथ का निर्माण खाती कारीगरों ने विद्वानों की सलाह और तत्कालीन महाराजा सवाई जय सिंह के निर्देश पर किया था। शास्त्रों में हाथियों को शुभ माना गया है, इसलिए इसे हाथियों से खींचे जाने योग्य बनाया गया। यह रथ केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि परंपरा और आस्था का प्रतीक भी था।
मुगल दरबार तक पहुंची ख्याति
इन्द्र विमान की विशेष बनावट और भव्यता की चर्चा मुगल दरबार तक पहुंची। इसके बाद एक और रथ तैयार कर मुगल बादशाह मुहम्मद शाह को भी भेंट किया गया। यह उस दौर में जयपुर की कारीगरी की पहचान बन गया था।
वर्तमान में कहां है इन्द्र विमान
आजादी के बाद से यह ऐतिहासिक रथ जयपुर के जलेब चौक स्थित बांदरवाल दरवाजे के भीतर रियासतकालीन रथखाने में सुरक्षित रखा गया है। यह आज भी शहर की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
धार्मिक और शाही आयोजनों में उपयोग
इन्द्र विमान का उपयोग बड़े धार्मिक अनुष्ठानों और शाही अवसरों पर किया जाता था। अश्वमेघ, राजसूय जैसे यज्ञों में महाराजा इसी रथ में बैठकर पहुंचते थे। सूर्य सप्तमी और जन्मदिवस पर भी इसकी शाही सवारी निकलती थी।
इतिहास में दर्ज है कि इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय को भी इस रथ में बैठाकर सवारी करवाई गई थी।
संरचना और विशेषताएं
इतिहासविदों के अनुसार, इस रथ को दो या चार हाथी खींचते थे। इसकी पहली मंजिल पर महाराजा और ऊपरी मंजिल पर रानियां बैठती थीं। विशेष अवसरों पर यह रथ शहर के जुलूसों और मेलों का मुख्य आकर्षण रहता था।
दोबारा निकालने का प्रयास
साल 1977 में जयपुर के 250वें स्थापना दिवस के दौरान इस रथ को बाहर निकालने का प्रयास किया गया था, हालांकि यह प्रयास सीमित ही रहा।
विरासत की जीवंत पहचान
इन्द्र विमान रथ जयपुर के इतिहास, कला और परंपरा का अनूठा प्रतीक है। यह आज भी उस दौर की भव्यता और शिल्पकला की कहानी बयां करता है।
.jpg)